Seven Lakes in Ujjain – Location and Unique Offerings Made at the Seven Holy Spots

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There are seven holy lakes (water bodies or ponds) in Ujjain. Unique offerings are made here. The seven lakes are:

  1. Rudra Sagar
  2. Pushkar Sagar
  3. Kshir Sagar
  4. Govardhan Sagar
  5. Vishnu Sagar
  6. Purushottam Sagar
  7. Ratnakar Sagar

Rudra Sagar is located between Harsiddhi and Mahakaleshwar temples. The main offerings here are salt and idols of Nandi.

Pushkar Sagar is located north of Sakhipur at Nalia Bakhal. The offerings here are yellow cloth and chana ki dal.

Kshir Sagar is located near Yogeshwar Tekri on Nai Sarak. Offerings here include milk, utensils and gold.

Govardhan Sagar is located at nikas chowraka. Offerings here include butter, sugar cakes, pot filled with molasses and red cloth.

Vishnu Sagar is located between Ram Janardan Mandir and Sandipani Ashram. Offerings here are idols of Vishnu, panchapatra, tarbhana and achmani.

Purushottam Saga is located between Idgah and Purushottam temple near Indira Nagar colony. Offering here is Malpua put in a chalni.

Ratnakar Sagar is located at Undasa Village. Clothes of women, cosmetics and pancharatna.

क्यों पवित्र है गंगा?असंख्य अस्थि विसर्जनो के बाद भी – जाने वैज्ञानिक और पौराणिक कारण…

हिन्दू सनातन धर्म में माँ गंगा नदी की महिमा को कौन नही जानता | यह देव नदी हरि के चरणों से निकली हुई है और अब भगवान शिव की जटाओ में बसी हुई है | कई सालो की घोर तपस्या करके भागीरथ ने इसे धरती पर बुलवाया और सागर के पुत्रो को मोक्ष दिलवाया|

तब से यह मान्यता हो गयी की इसमे स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप खत्म हो जाते है | हिन्दुओ की इस नदी में अपार आस्था है | मरते समय यदि किसी के मुँह में गंगा जल डाला जाये तो उसके प्राण आसानी से निकलते है और मोक्ष की प्राप्ति होती है | इसके अलावा मृत्यु के बाद मरने वाली की अस्थियो को गंगा में विसर्जित किया जाना भी आत्मा की शांति के लिए परम माना जाता है|

आज तक यह बात पहेली बना हुआ है की इस चमत्कारी नदी में असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन होने के बाद भी यह नदी पवित्र कैसे है |

वैज्ञानिको ने जब इस नदी के जल पर शोध किया तो पाया की इस नदी में पारा धातु की मात्रा अधिक है हो हड्डियों में विद्यमान कैल्सियम और फोस्फोरस को जल में विलीन कर देती है | अत: जल दूषित नही हो पाता|

गंगा नदी का पवित्र जल जिसकी कीर्ति हमारे धर्मग्रंथो में बताई गयी है | यह मोक्षदायिनी जल कहलाता है | ऐसी मान्यता है की मरते हुए व्यक्ति के मुख में यह डाल दे तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है|धार्मिक कार्यो में इस शुद्ध जल की जरुरत पड़ती है|

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क्यों है शिव को सावन (श्रावण) मास प्रिय ?

1) समुद्र-मंथन के समय जब हालाहल नामक विष सागर से निकला था। उस समय सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने इस विष को अपने गले में धारण कर लिया। यह घटना सावन के महीने में ही हुई थी | विष के ताप को शांत करने के लिए ब्रह्मा जी के कहने पर देवताओं ने शिव जी का जलाभिषेक किया और जड़ी बूटियों का भोग लगाया। इससे शिव जी का ताप शांत हुआ, इसके बाद से ही भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाने लगा इस अद्भुत घटना के कारण शिव को सावन अति प्रिय है और सावन में जलाभिषेक का अद्भुत फल मिलता है |

2) शास्त्रों के अनुसार सावन मास से ठीक पहलेदेवशयनी एकादशी वाले दिन भगवान विष्णुयोगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं। यही कारण है कि सावन में अन्य किसी भी देवता की पूजा से शिव की पूजा का कई गुणा फल प्राप्त होता है। इसलिए माना जाता है कि भगवान शिव को सावन सबसे अधिक प्रिय है।

3) शास्त्रों और पुराणों के अनुसार भगवान शिव का सावन मास प्रिय होने का एक कारण यह भी है कि, माता सती के देहत्याग करने के बाद जब आदिशक्ति ने पार्वती के रुप में जन्म लिया तो इसी महीने में तपस्या करके भगवान शिव को पति रुप में पाने का वरदान प्राप्त किया। यानी भगवान शिव और पार्वती का मिलन इसी महीने में हुआ था। इसलिए यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।

4) इसी पवित्र सावन मास में भगवान शिव ने माता पार्वती को सर्वप्रथम राम-कथा सुनाई थी, सुनने को श्रवण कहते हैं | इसी राम कथा के सुनने और सुनाने (श्रावण) की परिपाटी में इस पवित्र माह को “श्रावण” कहा गया है और विश्व भर के हिन्दू इस माह में सत्य नारायण की कथा और राम चरित मानस का पाठ करते हैं |

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Some Important Life Lessons from Lord Shiva That Everyone Should Learn

Lord Shiva – the supreme god in Hinduism is known to us by many names, he has 108 different avatars with different names. He is the ultimate – the creator and the destroyer of the universe. Multi-faceted, lord Shiva is the giver of wisdom. Here are 10 very important life lessons from Lord Shiva that everyone show learn

1. Never Ever Tolerate Evil

Lord Shiva never tolerated injustice.He is the destroyer of all evil things. He was fair even when destroying the rakshasas according to the Hindu texts. We should work towards zero-tolerance of evil around us and take a firm stand against injustice.

2. Exercise Self-Control

When in control, everything falls into place. Self-control is the key to a great life. It keeps one focused, aligned and determined.

3. Anger is never the answer

Lord Shiva is Maha Yogi as he meditated for hours and it was through his cool intellect the well-being of our universe severely depend on. Only extremities disturbed his mind and resulted in rage. Therefore, when fighting life’s battles, anger is never the answer. It will force you to do the extreme which achieves nothing. Being cool and calm will help you get a new perspective and win over your battles.


4. Happiness does not equal to materialism

If you have nothing it doesn’t mean you are missing out in life. Being attached to wealth or assets only leads to being tied down – physically, mentally and emotionally.


5. Take it in your stride

No matter what comes our way, we need to be prepared and take it in our stride.

6. Your Obsession will be your downfall

According to ancient Hindu text, Ramayana, Ravana’s obsession over Sita led to his end. Therefore, your obsession will lead to nothing but your own destruction. Lord Shiva never obsessed over anything and was free from all desires.

7. Nothing lasts forever

We human beings have a tendency to hoard things – possessions, people, relationships and, of course, feelings. But everything has a shelf-life and nothing will last forever. We need to learn to move on and be ready to face whatever comes our way.


8. Research will fetch new avenues

Always research before you start something new. Ganga Ma, encased in Lord Shiva’s hair represents the end of ignorance. She embodies unfathomable knowledge. Denial doesn’t help anyone and therefore, it is important to gather information before you plan to start anything new.


9. Respect your spouse/partner

Lord Shiva is also known as Ardhanarishwar, i.e. half man and half woman, and therefore, His wife, Mata Parvati was an essential part of him. He always treated her with the utmost respect. She was his Shakti and Shiva can never be apart from strength. Therefore, our spouse – wives or husbands, partners in life, are truly our better halves and we need to treat them with absolute respect and love.


10. Ego has no place in your life

A person’s ego is the biggest cause of all obstacles. Ego has ruined many goals, relationships, ideas, and dreams. It makes one bitter and aloof. Lord Shiva carried the Trishul to keep his ego in check. He never let his emotions get the better of himself. Similarly, he did not tolerate anyone’s ego either.
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भगवान शिव की पीठ है केदारनाथ, जानें बाकी 4 अंग कहां हैं स्थापित

उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। सारी दुनिया में भगवान शिव के करोड़ों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच केदार सर्वोपरि हैं। भगवान शिव ने अपने महिषरूप अवतार में पांच अंग, पांच अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए थे। जिन्हें मुख्य केदारनाथ पीठ के अतिरिक्त चार और पीठों सहित पंच केदार कहा जाता है।
आइए अब जानते है भगवान शिव के पंच केदारों के बारे में-

1.केदारनाथ1_kedarnath-temple

यह मुख्य केदारपीठ है। इसे पंच केदार में से प्रथम कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होने पर अपने ही कुल के लोगों का वध करने के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वेदव्यास जी की आज्ञा से पांडवों ने यहीं पर भगवान शिव की उपासना की थी। तब भगवान शिव ने उनकी तपस्या से खुश होकर महिष अर्थात बैल रूप में दर्शन दिये थे और उन्हें पापों से मुक्त किया था। तब से महिषरूपधारी भगवान शिव का पृष्ठभाग यहां शिलारूप में स्थित है।

2.मध्यमेश्वर-

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इन्हें मनमहेश्वर या मदनमहेश्वर भी कहा जाता हैं। इन्हें पंच केदार में दूसरा माना जाता है। यह ऊषीमठ से 18 मील दूरी पर है। यहां महिषरूपधारी भगवान शिव की नाभि लिंग रूप में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने अपनी मधुचंद्र रात्रि यही पर मनाई थी। यहां के जल की कुछ बूंदे ही मोक्ष के लिए पर्याप्त मानी जाती है।

3.तुंगनाथ-tungnath-temple

इसे पंच केदार का तीसरा माना जाता हैं। केदारनाथ के बद्रीनाथ जाते समय रास्ते में यह क्षेत्र पड़ता है। यहां पर भगवान शिव की भुजा शिला रूप में स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्वयं पांडवों ने करवाया था। तुंगनाथ शिखर की चढ़ाई उत्तराखंड की यात्रा की सबसे ऊंची चढ़ाई मानी जाती है।


4.
रुद्रनाथ-

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यह पंच केदार में चौथे हैं। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव का मुख स्थित हैं। तुंगनाथ से रुद्रनाथ-शिखर दिखाई देता है पर यह एक गुफा में स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग बेदह दुर्गम है। यहां पंहुचने का एक रास्ता हेलंग (कुम्हारचट्टी) से भी होकर जाता है।

 

5.कल्पेश्वर-5__kalpeshwar-temple

यह पंच केदार का पांचवा क्षेत्र कहा जाता है। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। अलखनन्दा पुल से 6 मील पार जाने पर यह स्थान आता है। इस स्थान को उसगम के नाम से भी जाना जाता है। यहां के गर्भगृह का रास्ता एक प्राकृतिक गुफा से होकर जाता है।

क्यों चढ़ता है शिवलिंग पर जल??

हम सब जानते है देवतओं और दानवो ने सागर मंथन किया जिसमे अच्छी और बुरी दोनों चीजे निकली। उसी मंथन में हलाहल नाम का विष भी निकला और उस से समस्त विश्व विनाश की और बढ़ने लगा। किसी में इतनी शक्ति नहीं थी की उस विष के जानलेवा प्रभाव को रोक सके। विश्व को विष से बचाने के लिए।
शिव जी ने विष पी लिया और अपने कंठ में रख लिया। इस से उन का कंठ नीला पड़ने लग गया।

उससे ही महादेव का नाम नीलकंठ पड़ा। परंतु विष के प्रभाव से उनका समस्त शरीर अत्यधिक गरम हो गया।। उस की वजह से आस पास का वातावरण भी जलने लगा।।
सभी देवी देवताओं ने बेल पत्र शिवजी को खिलाना शुरू कर दिया। बेलपत्र विष के प्रभाव को कम करता है साथ में उन पर जल डालना भी शुरू कर दिया ताकि गर्मी का प्रभाव कम होने लगे।

उस के प्रभाव से शिव जी के शरीर की विष से उत्पन्न हुई गरमी शांत होने लगी।।तभी से यहां प्रथा चलती आ रही है।।

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KUMBH MELA UJJAIN 2016

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Kumbh The celebration of Kumbh Mela takes place at the four sacred places as per the position of Sun and Jupiter in different zodiac signs. Poorna Kumbh is held at Ujjain once in every 12 years when the zodiac sign Scorpio (Vrishchik Rashi) indicates the presence of Jupiter and Sun. Ujjain is located at the bank of Shipra River in western region of Madhya Pradesh and is seen as one of the most sacred places in India. The city is enriched with several religious shrines such as Bade Ganeshji Ka Mandir, Mahakaleshwar, Vikram Kirti Temple and many others. On the occasion of Kumbh Mela the divinity and spiritual aroma of Ujjain meets its highest peak when millions of pilgrims take dips and worship sacred River Shipra. Sages and devotees from every nook and corner attend the religious ceremony of Kumbh Mela to attain salvation and libration from the vicious cycle of birth-death-rebirth.

According The commemoration of Mela at Ujjain is known as ‘Simhastha Kumbh Mela’ in which the unique combination of divinity and purity is experienced when the crowd of ash-dubbed sages, priests, devotees gets fused together with the roaring of elephants and camels. People who witness the spiritual fest feel good fortune by their side and sense positive aroma purifying their souls and thoughts. Major attraction of this festival is ‘Shahi Snan’ (royal bath) which takes place on predetermined dates varying every year. It is believed that those who take royal bath in holy Shipra River on the occasion of Kumbh Mela wash their sins of all previous births. The devotees consider it as an opportunity to get them revived from the never ending birth cycle.

UJJAIN KUMBH MELA DATES

In the year 2016, next Simhastha Kumbh Mela will be commemorated in Ujjain. Do not miss the opportunity and embrace your soul and material body with the sacred nectar bestowed by God.

Main Bathing Dates for Ujjain Kumbh Mela
22 April 2016 (Friday) Purnima – Full Moon (First Snan)
06 May 2016 (Friday) Vaishakh Krishna Amavasya
09 May 2016 (Monday) Shukla/Akshey Tritya (Second Snan)
11 May 2016 (Wednesday) Shukla Panchami
17 May 2016 (Saturday) Ekadashi & Pradosh Snan
21 May 2016 (Saturday) Purnima

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Maha Mrityunjay Mantra

Maha Mrityunjay Mantra

The Maha Mrityunjay Mantra or Lord Shiva Mantra is considered extremely powerful and significant by the Hindus. Also known as the Moksha Mantra of Lord Shiva, chanting of Maha Mrityunjaya Mantra is said to create divine vibrations that heals. Devotees of Lord Shiva further believe that Maha Mrityunjay evokes the Shiva within human beings and removes the fear of death, liberating one from the cycle of death and rebirth.

Significance of Maha Mrityunjaya Mantra
Devotees strongly believe that proper recitation of the Maha Mrityunjaya rejuvenates, bestows health, wealth, long life, peace, prosperity and contentment. It is said that chanting of Shiva Mantra generates divine vibrations that ward off all the negative and evil forces and creates a powerful protective shield. Besides, it is said to protect the one who chants against accidents and misfortunes of every kind. Recitation of the mantra creates vibration that pulsates through every cell, every molecule of human body and tears away the veil of ignorance. Hindus believe that recitation of the mantra ignites a fire within that consumes all negativity and purifies entire system. It is also said to have a strong healing power and can cure diseases declared incurable even by the doctors. Many believe Maha Mrityunjay Mantra to be a mantra that can conquer death and connect human beings to their own inner divinity.

The Maha Mrityunjaya Mantra
The following Maha Mrityunjay Mantra has been taken from the Sukla Yajurveda Samhita III. 60. The Mantra is addressed to Lord Shiva and is a centuries old technique of connecting one to pure consciousness and bliss.

Om Tryambhakam Yajamahe
Sugandhim Pushtivardhanam |
Urvarukamiva Bandhanan
Mrityor Mukshiya Maamritat ||

Meaning:
Om. We worship The Three-Eyed Lord Shiva who is fragrant and who increasingly nourishes the devotees. Worshipping him may we be liberated from death for the sake of immortality just as the ripe cucumber easily separates itself from the binding stalk.

Explanation:
The mantra is a prayer to Lord Shiva who is addressed as Sankara and Trayambaka. Sankara is sana (blessings) and Kara (the Giver). Trayambaka is the three eyed one (where the third eye signifies the giver of knowledge, which destroys ignorance and releases us from the cycle of death and rebirth).

Best Time to Chant
Chanting the Maha Mrityunjaya Mantra with sincerity, faith and devotion in Bramha Muhurata is very beneficial. But one can also do Maha Mrityunjaya japa anytime in a pure environment with great benefit and discover the happiness that′s already within.

 

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खास है यह शिव मंदिर, रामायण काल से जुड़ा है इसका इतिहास

भगवान शिव के मंदिर पूरी दुनिया में बने हुए हैं। भगवान शिव के कई ऐसे मंदिर हैं, जिनका संबंध पौराणिक समय से जुड़ा हुआ है।
shivकर्नाटक राज्य में उत्तर कन्नड़ जिला है, इस जिले की भटकल तहसील में ही मुरुदेश्वर मंदिर है। यह मंदिर अरब सागर के तट पर बना हुआ है। समुद्र तट होने की वजह से यहां का प्राकृतिक वातावरण हर किसी का मन मोह लेता है। बेहद सुंदर होने के साथ-साख यह शिव मंदिर बहुत ही खास भी है, क्योंकि इस मंदिर के परिसर में भगवान शिव की एक विशाल मूर्ति स्थापित हैं। वह मूर्ति इतनी बड़ी और आकर्षक है कि उसे दुनिया की दूसरी सबसे विशाल शिव प्रतिमा माना जाता हैं।

 

इसलिए है इस जगह का संबंध रामायण काल से

कथाओं के अनुसार, रामायण काल में रावण जब शिवजी से अमरता का वरदान पाने के लिए तपस्या कर रहा था, तब शिवजी ने प्रसन्न होकर रावण को एक शिवलिंग दिया, जिसे आत्मलिंग कहा जाता है। इस आत्मलिंग के संबंध में शिवजी ने रावण से कहा था कि इस आत्मलिंग को लंका ले जाकर स्थापित करना, लेकिन एक बात का ध्यान रखना कि इसे जिस जगह पर रख दिया जाएगा, यह वहीं स्थापित हो जाएगा। अत: यदि तुम अमर होना चाहते हो तो इस लिंग को लंका ले जा कर ही स्थापित करना।
रावण इस आत्मलिंग को लेकर चल दिया। सभी देवता यह नहीं चाहते थे कि रावण अमर हो जाए इसलिए भगवान विष्णु ने छल करते हुए वह शिवलिंग रास्ते में ही रखवा दिया। जब रावण को विष्णु का छल समझ आया तो वह क्रोधित हो गया और इस आत्मलिंग को नष्ट करने का प्रयास किया। तभी इस लिंग पर ढंका हुआ एक वस्त्र उड़कर मुरुदेश्वर क्षेत्र में आ गया था। इसी दिव्य वस्त्र के कारण यह तीर्थ क्षेत्र माना जाने लगा है।

मंदिर परिसर में बनी हैं भगवान शिव की विशाल मूर्ति

मुरुदेश्वर मंदिर में भगवान शिव की विशाल मूर्ति स्थापित हैं, जिसकी ऊंचाई लगभग 123 फीट है। यह मूर्ति भगवान शिव की दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची मूर्ति मानी जाती है। इस मूर्ति को इस ढंग से बनवाया गया है कि इस पर दिनभर सूर्य की किरणें पड़ती रहती हैं और यह चमकती रहती है।

बहुत सुंदर है यहां का नजारा

यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना हुई है और इसके तीन ओर अरब सागर है। पहाड़, हरियाली और नदियों की वजह से यह क्षेत्र बहुत ही सुंदर और आकर्षक लगता है। मंदिर में भगवान शिव का आत्मलिंग भी स्थापित है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो हाथियों की मूर्तियां स्थापित हैं।

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भगवान शिव के विदेशों में बने हुए 10 भव्य मंदिर

भारतीय संस्कृति के साथ देवी-देवताओं के मंदिर भी दुनियाभर में हैं। अधिकतर देशों में भगवान शिव मंदिर पाए जाते हैं। कुछ मंदिर ऐसे हैं जो उन देशों के लिए पर्यटन का बड़ा केंद्र भी बन गए हैं। विदेशों में भगवान शिव के कई मंदिर तो ऐसे भी हैं, जिनमें भारतीय भक्त कम विदेशी ज्यादा हैं।
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1. अरुल्मिगु श्रीराजा कलिअम्मन मंदिर (जोहोर बरु, मलेशिया)

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1922 के आस-पास किया गया था। यह मंदिर जोहोर बरु के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। जिस भूमि पर यह मंदिर बना हुआ है, वह भूमि जोहोर बरु के सुल्तान द्वारा भेंट के रूप में भारतीयों को प्रदान की गई थी। कुछ समय पहले तक यह मंदिर बहुत ही छोटा था, लेकिन आज यह एक भव्य मंदिर बन चुका है। मंदिर के गर्भ गृह में लगभग 3,00,000 मोतियों को दीवार पर चिपकाकर सजावट की गई है।

2. शिवा हिन्दू मंदिर (जुईदोस्त, एम्स्टर्डम)

यह मंदिर लगभग 4,000 वर्ग मीटर को क्षेत्र में फैला हुआ है। इस मंदिर के दरवाजे भक्तों के लिए जून 2011 को खोले गए थे। इस मंदिर में भगवान शिव के साथ-साथ भगवान गणेश, देवी दुर्गा, भगवान हनुमान की भी पूजा की जाती है। यहां पर भगवान शिव पंचमुखी शिवलिंग के रूप में है।

3. मुन्नेस्वरम मंदिर (मुन्नेस्वरम, श्रीलंका)

इस मंदिर के इतिहास को रामायण काल से जोड़ा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, रावण का वध करने के बाद भगवान राम ने इसी जगह पर भगवान शिव की आराधना की थी। इस मंदिर परिसर में पांच मंदिर हैं, जिनमें से सबसे बड़ा और सुंदर मंदिर भगवान शिव का ही है। कहा जाता है कि पुर्तगालियों ने दो बार इस मंदिर पर हमला कर नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी।

4. कटासराज मंदिर (चकवाल, पाकिस्तान)

कटासराज मंदिर पाकिस्तान के चकवाल गांव से लगभग 40 कि.मी. की दूरी पर कटस में एक पहाड़ी पर है। कहा जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल (त्रेतायुग) में भी था। इस मंदिर से जुड़ी पांडवों की कई कथाएं प्रसिद्ध हैं। मान्यताओं के अनुसार, कटासराज मंदिर का कटाक्ष कुंड भगवान शिव के आंसुओं से बना है। इस कुंड के निर्माण के पीछे एक कथा है। कहा जाता है कि जब देवी सती की मृत्यु हो गई, तब भगवान शिव उन के दुःख में इतना रोए की उनके आंसुओं से दो कुंड बन गए। जिसमें से एक कुंड राजस्थान के पुष्कर नामक तीर्थ पर है और दूसरा यहां कटासराज मंदिर में।

5. शिवा-विष्णु मंदिर (मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया)

भगवान शिव और विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण लगभग 1987 के आस-पास किया गया था। मंदिर का उद्घाटन कांचीपुरम और श्रीलंका से दस पुजारियों ने पूजा करके किया था। इस मंदिर की वास्तुकला हिन्दू और ऑस्ट्रेलियाई परंपराओं का अच्छा उदाहरण है। मंदिर परिसर के अंदर भगवान शिव और विष्णु के साथ-साथ अन्य हिंदू देवी-देवताओं की भी पूजा-अर्चना की जाती है।

6. शिवा मंदिर (ऑकलैंड, न्यूजीलैंड)

न्यूजीलैंड के इस मंदिर की स्थापना का मुख्य कारण लोगों के बीच हिंदू धर्म के प्रति आस्था और विश्वार बढ़ाना था। इस मंदिर के निर्माण के बाद 2004 में यह मंदिर आम भक्तों के लिए खोला गया था। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी शिवेंद्र महाराज और यज्ञ बाबा के मार्गदर्शन में हिन्दू शास्त्रों के अनुसार किया गया था। इस मंदिर में भगवान शिव को नवदेश्वर शिवलिंग के रूप में है।

7. शिवा विष्णु मंदिर (लिवेरमोरे, कैलिफोर्निया)

यह मंदिर इस क्षेत्र के हिंदू मंदिरों में से सबसे बड़ा मंदिर कहा जाता है। वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर उत्तर भारत और दक्षिण भारत की कला का सुंदर मिश्रण है। मंदिर में भगवान शिव के साथ-साथ भगवान गणेश, देवी दुर्गा, भगवान अय्यप्पा, देवी लक्ष्मी आदि की भी पूजा की जाती है। मंदिर की अधिकांश मूर्तियों 1985 में तमिलनाडु सरकार द्वारा दान की गई थी।

8. पशुपतिनाथ मंदिर (काठमांडू, नेपाल)

पशुपतिनाथ का मतलब होता है संसार के समस्त जीवों के भगवान। मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था। दीमक की वजह से मंदिर को बहुत नुकसान हुआ, जिसकी कारण लगभग 17वीं सदी में इसका पुनर्निर्माण किया गया। मंदिर में भगवान शिव की एक चार मुंह वाली मूर्ति है। इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति तक पहुंचने के चार दरवाजे बने हुए हैं। वे चारों दरवाजे चांदी के हैं। यह मंदिर हिंदू और नेपाली वास्तुकला का एक अच्छा मिश्रण है।

9. शिवा टैम्पल (जुरीच, स्विट्ज़रलैंड)

यह एक छोटा लेकिन सुंदर शिव मंदिर है। यहां के गर्भ गृह में शिवलिंग के पीछे भगवान शिव की नटराज स्वरूप में और देवी पार्वती की शक्ति से रूप में मूर्तियां स्थित है। इस मंदिर में भगवान शिव से जुड़े हुए सभी त्योहार बहुत ही धूम-धाम से मनाए जाते हैं।

10. प्रम्बानन मंदिर (जावा, इंडोनेशिया)

हिंदू संस्कृति और देवी-देवताओं को समर्पित एक बहुत सुंदर और प्राचीन मंदिर इंडोनेशिया के जावा नाम की जगह पर है। 10वीं शताब्दी में बना यह मंदिर प्रम्बानन मंदिर के नाम से जाना जाता है। प्रम्बानन मंदिर शहर से लगभग 17 कि.मी. की दूरी पर है।

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