WHY GANGAJAL (HOLY WATER FROM GANGA )IS POURED ON SHIVLING IN THE MONTH OF SHRAVAN…

Millions of Hindu devotees visit Shiva temples in the Hindi month of Shravan in North India and offer Gangajal or holy water from River Ganga, to Lord Shiva. The water is used to bath Shivling at temples, sacred places and in homes. Shrawan Month, also referred as Saawan, is dedicated to Lord Shiva and the Mondays, or Somwar, in the month are considered highly auspicious.
The famous Samudra Manthan (churning of ocean) episode in Hinduism took place in the Shravan month and among the things that came out during the churning were 14 types of rubies. Gods (Devas) and demons (Asuras) who were churning the ocean distributed 13 rubies among them. The 14th ruby was the poison called ‘halahal’ and it had the power to destroy all the living beings. Lord Shiva drank ‘halahal’ to save the world and it was stored in his throat and from this day Lord Shiva came to be known as Neelkanth.

To reduce the effect of poison ‘halahal’ on Shiva all the Devas that were witnessing the Samudra Manthan poured Gangajal on Shiva. This tradition is even today continued in most of the major temples dedicated to Lord Shiva. This ritual is widely performed in the Shravan month in North India by Hindu devotees.It is widely believed that Lord Shiva blesses those who bath him in holy water from River Ganga. Kanwarias in large number visit Shiva shrines like Baba Baidyanath Dham in Deoghar and Kashi Vishwanath Temple in the month.

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क्यों पवित्र है गंगा?असंख्य अस्थि विसर्जनो के बाद भी – जाने वैज्ञानिक और पौराणिक कारण…

हिन्दू सनातन धर्म में माँ गंगा नदी की महिमा को कौन नही जानता | यह देव नदी हरि के चरणों से निकली हुई है और अब भगवान शिव की जटाओ में बसी हुई है | कई सालो की घोर तपस्या करके भागीरथ ने इसे धरती पर बुलवाया और सागर के पुत्रो को मोक्ष दिलवाया|

तब से यह मान्यता हो गयी की इसमे स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप खत्म हो जाते है | हिन्दुओ की इस नदी में अपार आस्था है | मरते समय यदि किसी के मुँह में गंगा जल डाला जाये तो उसके प्राण आसानी से निकलते है और मोक्ष की प्राप्ति होती है | इसके अलावा मृत्यु के बाद मरने वाली की अस्थियो को गंगा में विसर्जित किया जाना भी आत्मा की शांति के लिए परम माना जाता है|

आज तक यह बात पहेली बना हुआ है की इस चमत्कारी नदी में असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन होने के बाद भी यह नदी पवित्र कैसे है |

वैज्ञानिको ने जब इस नदी के जल पर शोध किया तो पाया की इस नदी में पारा धातु की मात्रा अधिक है हो हड्डियों में विद्यमान कैल्सियम और फोस्फोरस को जल में विलीन कर देती है | अत: जल दूषित नही हो पाता|

गंगा नदी का पवित्र जल जिसकी कीर्ति हमारे धर्मग्रंथो में बताई गयी है | यह मोक्षदायिनी जल कहलाता है | ऐसी मान्यता है की मरते हुए व्यक्ति के मुख में यह डाल दे तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है|धार्मिक कार्यो में इस शुद्ध जल की जरुरत पड़ती है|

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क्यों है शिव को सावन (श्रावण) मास प्रिय ?

1) समुद्र-मंथन के समय जब हालाहल नामक विष सागर से निकला था। उस समय सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने इस विष को अपने गले में धारण कर लिया। यह घटना सावन के महीने में ही हुई थी | विष के ताप को शांत करने के लिए ब्रह्मा जी के कहने पर देवताओं ने शिव जी का जलाभिषेक किया और जड़ी बूटियों का भोग लगाया। इससे शिव जी का ताप शांत हुआ, इसके बाद से ही भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाने लगा इस अद्भुत घटना के कारण शिव को सावन अति प्रिय है और सावन में जलाभिषेक का अद्भुत फल मिलता है |

2) शास्त्रों के अनुसार सावन मास से ठीक पहलेदेवशयनी एकादशी वाले दिन भगवान विष्णुयोगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं। यही कारण है कि सावन में अन्य किसी भी देवता की पूजा से शिव की पूजा का कई गुणा फल प्राप्त होता है। इसलिए माना जाता है कि भगवान शिव को सावन सबसे अधिक प्रिय है।

3) शास्त्रों और पुराणों के अनुसार भगवान शिव का सावन मास प्रिय होने का एक कारण यह भी है कि, माता सती के देहत्याग करने के बाद जब आदिशक्ति ने पार्वती के रुप में जन्म लिया तो इसी महीने में तपस्या करके भगवान शिव को पति रुप में पाने का वरदान प्राप्त किया। यानी भगवान शिव और पार्वती का मिलन इसी महीने में हुआ था। इसलिए यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।

4) इसी पवित्र सावन मास में भगवान शिव ने माता पार्वती को सर्वप्रथम राम-कथा सुनाई थी, सुनने को श्रवण कहते हैं | इसी राम कथा के सुनने और सुनाने (श्रावण) की परिपाटी में इस पवित्र माह को “श्रावण” कहा गया है और विश्व भर के हिन्दू इस माह में सत्य नारायण की कथा और राम चरित मानस का पाठ करते हैं |

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Lingam Puja – How to Worship Shivling at Home? – Rules of Worshiping Shiva Lingam

Shivling or Shiva lingam connects a devotee with the Supreme Being – Lord Shiva. The lingam is the symbol of Lord Shiva and the lingam puja helps the devotee in understanding Lord Shiva. The Lord cannot be described but still we say he is without a beginning and an end and is without a form. It is difficult for a devotee to understand this formless nature. Therefore Lord Shiva appeared in the form of Jyotirlinga before Brahma and Vishnu. The Lingam thus is a symbol of Lord Shiva. Each Lingam puja, step by step, takes the devotee to the eternal truth – that he/she is part of the Supreme Being.

Worshipping Shivling at Home – Rules of Worshiping Shiva Lingam

Before starting the Puja, the devotee takes a bath and wear freshly washed clothes. Hymns praising Lord Shiva or the mantra ‘om namaha shivayaa’ are repeated to create a mood for worship. Then, the devotee sits in front of the lingam and blows conch or ring bells. This indicates the beginning of the Puja.

First it is the panchamrit abhishek – the libation of five holy liquids over the lingam. The libation can consist of any five of the following – water from river Ganga, honey, sugarcane juice, milk, yogurt, ghee, seawater, coconut water or milk, fragrant oils, rose water or other precious liquids. Usually, only milk of cow is used. While pouring the liquid, om namah shivaya is uttered. Some devotees utter the Lord’s name 108 times and some 1008 times. There is no fixed rule.

After the panchamrit abhishek, the lingam is cleaned with water from Ganga. (This is might not be possible always so just normal water.) After this the lingam is smeared with sandalwood paste and is decked with flowers. Water and sandalwood paste is used to keep the lingam cool, as Lord Shiva is always in a highly inflammable state. In some Shiva temples, cooling liquid constantly drops from pot hung above the Lingam.

Next, sweets, coconut and fruits are offered to the Lord. Camphor and incense are lit and ‘aarti’ is conducted. Some devotees fan the lingam and sing praises of the lord.

Finally, ringing of bells or blowing of conch indicates the end of Puja. White ash (vibhuti) is rubbed on the forehead and it is also distributed. Fruits, sweets and coconut are distributed as ‘prasad.’

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भगवान शिव की पीठ है केदारनाथ, जानें बाकी 4 अंग कहां हैं स्थापित

उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। सारी दुनिया में भगवान शिव के करोड़ों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच केदार सर्वोपरि हैं। भगवान शिव ने अपने महिषरूप अवतार में पांच अंग, पांच अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए थे। जिन्हें मुख्य केदारनाथ पीठ के अतिरिक्त चार और पीठों सहित पंच केदार कहा जाता है।
आइए अब जानते है भगवान शिव के पंच केदारों के बारे में-

1.केदारनाथ1_kedarnath-temple

यह मुख्य केदारपीठ है। इसे पंच केदार में से प्रथम कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होने पर अपने ही कुल के लोगों का वध करने के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वेदव्यास जी की आज्ञा से पांडवों ने यहीं पर भगवान शिव की उपासना की थी। तब भगवान शिव ने उनकी तपस्या से खुश होकर महिष अर्थात बैल रूप में दर्शन दिये थे और उन्हें पापों से मुक्त किया था। तब से महिषरूपधारी भगवान शिव का पृष्ठभाग यहां शिलारूप में स्थित है।

2.मध्यमेश्वर-

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इन्हें मनमहेश्वर या मदनमहेश्वर भी कहा जाता हैं। इन्हें पंच केदार में दूसरा माना जाता है। यह ऊषीमठ से 18 मील दूरी पर है। यहां महिषरूपधारी भगवान शिव की नाभि लिंग रूप में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने अपनी मधुचंद्र रात्रि यही पर मनाई थी। यहां के जल की कुछ बूंदे ही मोक्ष के लिए पर्याप्त मानी जाती है।

3.तुंगनाथ-tungnath-temple

इसे पंच केदार का तीसरा माना जाता हैं। केदारनाथ के बद्रीनाथ जाते समय रास्ते में यह क्षेत्र पड़ता है। यहां पर भगवान शिव की भुजा शिला रूप में स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्वयं पांडवों ने करवाया था। तुंगनाथ शिखर की चढ़ाई उत्तराखंड की यात्रा की सबसे ऊंची चढ़ाई मानी जाती है।


4.
रुद्रनाथ-

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यह पंच केदार में चौथे हैं। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव का मुख स्थित हैं। तुंगनाथ से रुद्रनाथ-शिखर दिखाई देता है पर यह एक गुफा में स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग बेदह दुर्गम है। यहां पंहुचने का एक रास्ता हेलंग (कुम्हारचट्टी) से भी होकर जाता है।

 

5.कल्पेश्वर-5__kalpeshwar-temple

यह पंच केदार का पांचवा क्षेत्र कहा जाता है। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। अलखनन्दा पुल से 6 मील पार जाने पर यह स्थान आता है। इस स्थान को उसगम के नाम से भी जाना जाता है। यहां के गर्भगृह का रास्ता एक प्राकृतिक गुफा से होकर जाता है।

Om Tatpurushaay Vidmahe Mahadevaay Deemahi Tanno Rudrah Prachodayat..

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Lord Shiva is the deity of Shiva Mantra. Shiva literally means “the One who is eternally pure” or “the One who not affected by three Gunas of Prakrti (Sattva, Rajas, and Tamas)’.
The word ‘Shiva’ means auspiciousness and perfection. Shiva is the power behind all the mantras. Shiva is the lord of ‘Immortality‘; He is the One who has conquered Death. The very utterance of his name rejuvenates the mind, body and soul. Shiva Mantras have tremendous healing powers. Shiva Mantras have the power to fulfill one’s desire and can be also used for attainment of the ultimate liberation – Moksha.

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क्यों चढ़ता है शिवलिंग पर जल??

हम सब जानते है देवतओं और दानवो ने सागर मंथन किया जिसमे अच्छी और बुरी दोनों चीजे निकली। उसी मंथन में हलाहल नाम का विष भी निकला और उस से समस्त विश्व विनाश की और बढ़ने लगा। किसी में इतनी शक्ति नहीं थी की उस विष के जानलेवा प्रभाव को रोक सके। विश्व को विष से बचाने के लिए।
शिव जी ने विष पी लिया और अपने कंठ में रख लिया। इस से उन का कंठ नीला पड़ने लग गया।

उससे ही महादेव का नाम नीलकंठ पड़ा। परंतु विष के प्रभाव से उनका समस्त शरीर अत्यधिक गरम हो गया।। उस की वजह से आस पास का वातावरण भी जलने लगा।।
सभी देवी देवताओं ने बेल पत्र शिवजी को खिलाना शुरू कर दिया। बेलपत्र विष के प्रभाव को कम करता है साथ में उन पर जल डालना भी शुरू कर दिया ताकि गर्मी का प्रभाव कम होने लगे।

उस के प्रभाव से शिव जी के शरीर की विष से उत्पन्न हुई गरमी शांत होने लगी।।तभी से यहां प्रथा चलती आ रही है।।

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KUMBH MELA UJJAIN 2016

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Kumbh The celebration of Kumbh Mela takes place at the four sacred places as per the position of Sun and Jupiter in different zodiac signs. Poorna Kumbh is held at Ujjain once in every 12 years when the zodiac sign Scorpio (Vrishchik Rashi) indicates the presence of Jupiter and Sun. Ujjain is located at the bank of Shipra River in western region of Madhya Pradesh and is seen as one of the most sacred places in India. The city is enriched with several religious shrines such as Bade Ganeshji Ka Mandir, Mahakaleshwar, Vikram Kirti Temple and many others. On the occasion of Kumbh Mela the divinity and spiritual aroma of Ujjain meets its highest peak when millions of pilgrims take dips and worship sacred River Shipra. Sages and devotees from every nook and corner attend the religious ceremony of Kumbh Mela to attain salvation and libration from the vicious cycle of birth-death-rebirth.

According The commemoration of Mela at Ujjain is known as ‘Simhastha Kumbh Mela’ in which the unique combination of divinity and purity is experienced when the crowd of ash-dubbed sages, priests, devotees gets fused together with the roaring of elephants and camels. People who witness the spiritual fest feel good fortune by their side and sense positive aroma purifying their souls and thoughts. Major attraction of this festival is ‘Shahi Snan’ (royal bath) which takes place on predetermined dates varying every year. It is believed that those who take royal bath in holy Shipra River on the occasion of Kumbh Mela wash their sins of all previous births. The devotees consider it as an opportunity to get them revived from the never ending birth cycle.

UJJAIN KUMBH MELA DATES

In the year 2016, next Simhastha Kumbh Mela will be commemorated in Ujjain. Do not miss the opportunity and embrace your soul and material body with the sacred nectar bestowed by God.

Main Bathing Dates for Ujjain Kumbh Mela
22 April 2016 (Friday) Purnima – Full Moon (First Snan)
06 May 2016 (Friday) Vaishakh Krishna Amavasya
09 May 2016 (Monday) Shukla/Akshey Tritya (Second Snan)
11 May 2016 (Wednesday) Shukla Panchami
17 May 2016 (Saturday) Ekadashi & Pradosh Snan
21 May 2016 (Saturday) Purnima

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Amazing Facts About Lord Shiva

Lord Shiva is one of the most famous Gods in Hinduism along with Lord Vishnu. He is revered by millions of Hindu devotees everywhere who visit his Jyotirlinga temples in order to seek his blessings. The worship of Lord Shiva has several great benefits for the life of devotees.

Great Facts About Lord Shiva

1. Shiva is the third god in the Hindu triumvirate. He is accountable for the destruction of the world. He is often depicted as having a temper, but is mostly seen in a meditative state. The other two gods are Brahma and Vishnu. Brahma is responsible for the creation of the world and Vishnu is responsible for running the world.

2. He wears elephant and tiger skins, and carries live cobras that dangle from his neck and has dreadlocks. He is also known as the lord of the animals- Pashupati

Shiva has a third eye on his forehead, which represents his wisdom and intuition. He carries a trident, which represents the three function of the triumvirate.

3. Shiva is called the Lord of Dance, or the Nataraja. His most important dance is the Tandev, the cosmic dance of death, which he performs at the end of every age to destroy the universe. He also performs the Lasya, which is the dance of creation.

4. Legend says that Shiva lives a simple life in the Kailas Mountains of the Himalayas with his wife, Parvati. He is usually spotted in a yogic position. Whenever Parvati is present, she is always at the left hand side of Shiva.

5. Shiva is also represented by Shiva Lingam, a phallic statue that symbolizes masculinity and creation.

6. In some Hindu legend, Shiva is known for his reckless life style. He rides a bull, and he often smokes weeds. He also loves meditating, and is called the Lord of Yoga.

7. Shiva and Parvati are husband and wife. They have two sons- Ganesh and Murugan.

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Maha Mrityunjay Mantra

Maha Mrityunjay Mantra

The Maha Mrityunjay Mantra or Lord Shiva Mantra is considered extremely powerful and significant by the Hindus. Also known as the Moksha Mantra of Lord Shiva, chanting of Maha Mrityunjaya Mantra is said to create divine vibrations that heals. Devotees of Lord Shiva further believe that Maha Mrityunjay evokes the Shiva within human beings and removes the fear of death, liberating one from the cycle of death and rebirth.

Significance of Maha Mrityunjaya Mantra
Devotees strongly believe that proper recitation of the Maha Mrityunjaya rejuvenates, bestows health, wealth, long life, peace, prosperity and contentment. It is said that chanting of Shiva Mantra generates divine vibrations that ward off all the negative and evil forces and creates a powerful protective shield. Besides, it is said to protect the one who chants against accidents and misfortunes of every kind. Recitation of the mantra creates vibration that pulsates through every cell, every molecule of human body and tears away the veil of ignorance. Hindus believe that recitation of the mantra ignites a fire within that consumes all negativity and purifies entire system. It is also said to have a strong healing power and can cure diseases declared incurable even by the doctors. Many believe Maha Mrityunjay Mantra to be a mantra that can conquer death and connect human beings to their own inner divinity.

The Maha Mrityunjaya Mantra
The following Maha Mrityunjay Mantra has been taken from the Sukla Yajurveda Samhita III. 60. The Mantra is addressed to Lord Shiva and is a centuries old technique of connecting one to pure consciousness and bliss.

Om Tryambhakam Yajamahe
Sugandhim Pushtivardhanam |
Urvarukamiva Bandhanan
Mrityor Mukshiya Maamritat ||

Meaning:
Om. We worship The Three-Eyed Lord Shiva who is fragrant and who increasingly nourishes the devotees. Worshipping him may we be liberated from death for the sake of immortality just as the ripe cucumber easily separates itself from the binding stalk.

Explanation:
The mantra is a prayer to Lord Shiva who is addressed as Sankara and Trayambaka. Sankara is sana (blessings) and Kara (the Giver). Trayambaka is the three eyed one (where the third eye signifies the giver of knowledge, which destroys ignorance and releases us from the cycle of death and rebirth).

Best Time to Chant
Chanting the Maha Mrityunjaya Mantra with sincerity, faith and devotion in Bramha Muhurata is very beneficial. But one can also do Maha Mrityunjaya japa anytime in a pure environment with great benefit and discover the happiness that′s already within.

 

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