Today is Earth Day – Hindu Religion and Nature

Today, April 22 is being observed as Earth Day. For Hindus all day is earth day. Take any Hindu scripture and one will find that Nature plays an important role in it. The earliest teachers of Sanatana Dharma saw Earth as a large family and knew the importance of each animate and inanimate in Nature. The Vedic teachers realized that the Supreme Soul (Brahman) resides in all living and non living being and he coined the great thought – Tattvamasi – Thou Art That and Vasudeva Kudumbakam – the world is a village.

A Hindu worships nature not out of fear but by realizing each living being is a representation of the Supreme Soul or God. Hindus worship and feed cows, ants, rats, bull, snakes…we find divinity in rivers, mountains, trees…Each and every aspect of Nature is Holy for a Hindu.

In the tenth chapter of Bhagavad Gita, Lord Krishna says

  • Now I will declare to you My Divine glories, immanent, in their prominence; O best of the Kurus, there is no end to the details of My extent.
  • I am the Self, O Gudakesha, seated in the hearts of all beings; I am the Beginning, the Middle and also the End of all beings.
  • Among the trees, I am the holy banyan tree (the Ashwattha tree – Pipal ),
  • Among the cows, I am the wish giving Kama Dhenu
  • And among the water bodies, I am the sea
  • And among the immovable, I am the Himalayas
  • Among the peaks, I am the divine Meru
  • Among the shining objects, I am the Sun God
  • And among the stars, I am the moon
  • Among those who move fast, I am the wind
  • And among the rivers, I am the Ganga
  • And among the seasons, I am the flowering spring
  • Among the animals, I am the lion,
  • And among the birds, I am the eagle.
  • Among the fishes I am the Shark.
  • Among the great elephants, I am Airavatha,
  • And I am Vasuki among serpents,
  • And whatsoever is the seed of all beings, that also am I, O Arjuna; there is no being, whether moving, or unmoving, that can exist without Me.

    When reading Hindu scriptures we realize that there was period when Nature was without human beings and there are indications in many scriptures that in future too there can be a period without Human Beings – the Supreme Soul appears to annihilate that which is straying from the path of Dharma. By destroying Nature and behaving as if we are above Nature we are straying from the path of Dharma and behaving like the demons in the holy books and inviting the wrath of the Supreme Being.

    Nature will survive even after human beings are gone. Man needs to change, if he needs to survive in Nature or Nature will find ways to eliminate Human Beings.

माँ दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है।

  • 🏾यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है।
  • 🏾ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं।

    🏾पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी।🏾इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। 🏾कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। 🏾कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया।🏾देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे।🏾अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।

  • 🏾मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है।
  • 🏾इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

🏾माँ ब्रह्मचारिणी मन्त्र-
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

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Ujjain Kumbh Mela 2016 dates in Madhya Pradesh in India

Kumbh Mela is the sacred holy pilgrimage in Hinduism. Kumbh Mela 2016 dates are from April 22 to May 21, 2016. It will be taking place at Ujjain on the banks of Shipra River in Madhya Pradesh in India.

Ujjain Kumbh Mela 2016 detail dates are given below.

The Kumbh Mela will begin on April 22, 2016

Shahi Snaan (Royal Holy Dip) – April 22, 2016

Pancheshani Yatra Start – May 1, 2016

Vratparv Varuthini Ekadashi – May 3, 2016

Vaishakh Krishna Amavasya – May 6, 2016

Akshaya Tritiya – May 9, 2016

Shankracharya Jayanti – May 11, 2016

Vrishabh Sankranti – May 15, 2016

Mohini Ekadashi – May 17, 2016

Pradosh – May 19, 2016

Narasimha Jayanti – May 20, 2016

Pramukh Shahi Snaan – May 21

The four Mondays during the period are also considered highly auspicious to take holy dip.

April 25, 2016
May 2, 2016
May 9, 2016
May 16, 2016

Planetary Position

The Ujjain Kumbh Mela is held on the banks of Shipra River at Ujjain when Sun is in the zodiac sign Aries (Mesha) and Jupiter in the zodiac Leo (Simha). This happens once in twelve years.

What happens in Ujjain Kumbh Mela?
Devotees take holy dip in Shipra River on the above said dates.

Simhasth Kumbh Mahaparv is celebrated by various Akharas. They undertake processions. The heads of Akharas join the procession on silver throne (Simhasanam) on elephants. The procession includes armed Sadhus on horses and camels followed by Sadhus, hermits and devotees. Peshwai completes at the Ram Ghat area on the banks of river Kshipra.

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“गंगा”

गंगा“, भारत की सर्वाधिक महिमामयी नदी है। इसे देवनदी, मंदाकिनी, भगीरथी, विश्नुपगा, देवपगा, देवनदी, आदि नामों से भी जाना जाता है। गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री है। यह हिमालय के उत्तरी भाग गंगोत्री से निकलकर नारायण पर्वत के पार्श्व से ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, प्रयाग, विंध्याचल, वाराणसी, पाटिलीपुत्र, मंदरगिरी, भागलपुर, बंगाल को सिंचित करती हुई गंगासागर में समाहित हो जाती हैं।

गंगा का हमारे देश के लिए बहुत अधिक महत्त्व है। गंगा नदी भारत के चार राज्यों में से होकर गुजरती है। ये हैं- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल। भारत के इस मध्यम भाग को ‘गंगा का मैदान’ कहा जाता है। यह प्रदेश अत्यंत उपजाऊ, संपन्न तथा हरा-भरा है जिसका श्रेय गंगा को ही है। इन राज्यों में कृषि-उपज से संबंधित तथा कृषि पर आधारित अनेक उद्योग-धंधे भी फैले हुए हैं जिनसे लाखों लोगों की जीविका तो चलती ही है, राष्ट्रीय आय में वृद्धि भी होती है। पेयजल भी गंगा और उसकी नहरों के माध्यम से प्राप्त होता है।

यदि गंगा न होती तो हमारे देश का एक महत्त्वपूर्ण भाग बंजर तथा रेगिस्तान होता। इसीलिए गंगा उत्तर भारत की सबसे पवित्र व महत्त्वपूर्ण नदी है। गंगा नदी भारतीय संस्कृति का भी अभिन्न अंग है। भारत के प्राचीन ग्रंथों; जैसे- वेद, पुराण, महाभारत आदि में गंगा की पवित्रता का वर्णन है। भारत के अनेक तीर्थ गंगा के किनारे पर ही स्थित हैं।

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इन 10 कारणों से प्रतिदिन पिए तांबे के बर्तन में रखा पानी (ताम्रजल)

सेहत के लिए पानी पीना अच्छी आदत है। स्वस्थ रहने के लिए हर इंसान को दिनभर में कम से कम 8-10 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए।
आयुर्वेद में कहा गया है सुबह के समय तांबे के पात्र का पानी पीना विशेष रूप से लाभदायक होता है। इस पानी को पीने से शरीर के कई रोग बिना दवा ही ठीक हो जाते हैं। साथ ही, इस पानी से शरीर के जहरीले तत्व बाहर निकल जाते हैं। रात को इस तरह तांबे के बर्तन में संग्रहित पानी को ताम्रजल के नाम से जाना जाता है।
ये ध्यान रखने वाली बात है कि तांबे के बर्तन में कम से कम 8 घंटे तक रखा हुआ पानी ही लाभकारी होता है । जिन लोगों को कफ की समस्या ज्यादा रहती है, उन्हें इस पानी में तुलसी के कुछ पत्ते डाल देने चाहिए। बहुत कम लोग जानते हैं कि तांबे के बर्तन का पानी पीने के बहुत सारे फायदे हैं।

1. हमेशा दिखेंगे जवान :
कहते हैं, जो पानी ज्यादा पीता है उसकी स्किन पर अधिक उम्र में भी झुर्रियां दिखाई नहीं देती हैं। ये बात एकदम सही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर आप तांबे के बर्तन में जल को रखकर पिएं तो इससे त्वचा का ढीलापन आदि दूर हो जाता है। डेड स्किन भी निकल जाती है और चेहरा हमेशा चमकता हुआ दिखाई देता है।

2. थायराइड को करता है नियंत्रित :
थायरेक्सीन हार्मोन के असंतुलन के कारण थायराइड की बीमारी होती है। थायराइड के प्रमुख लक्षणों में तेजी से वजन घटना या बढ़ना, अधिक थकान महसूस होना आदि हैं। थायराइड एक्सपर्ट मानते है कि कॉपर के स्पर्श वाला पानी शरीर में थायरेक्सीन हार्मोन को बैलेंस कर देता है। यह इस ग्रंथि की कार्यप्रणाली को भी नियंत्रित करता है। तांबे के बर्तन में रखे पानी को पीने से रोग नियंत्रित हो जाता है।

3. गठिया में होता है फायदेमंद :
आजकल कई लोगों को कम उम्र में ही गठिया और जोड़ों में दर्द की समस्या सताने लगती हैं। यदि आप भी इस समस्या से परेशान हैं तो रोज तांबे के पात्र का पानी पिएं। गठिया की शिकायत होने पर तांबे के बर्तन में रखा हुआ जल पीने से लाभ मिलता है। तांबे के बर्तन में ऐसे गुण आ जाते हैं, जिनसे बॉडी में यूरिक एसिड कम हो जाता है और गठिया व जोड़ों में सूजन के कारण होने वाले दर्द में आराम मिलता है।

4. स्किन को बनाए स्वस्थ :
अधिकतर लोग हेल्दी स्किन के लिए तरह-तरह के कॉस्मेटिक्स का उपयोग करते हैं। वो मानते हैं कि अच्छे कॉस्मेटिक्स यूज करने से त्वचा सुंदर हो जाती है, लेकिन ये सच नहीं है। स्किन पर सबसे अधिक प्रभाव आपकी दिनचर्या और खानपान का पड़ता है। इसलिए अगर आप अपनी स्किन को हेल्दी बनाना चाहते हैं तो तांबे के बर्तन में रातभर पानी रखें और सुबह उस पानी को पी लें। नियमित रूप से इस नुस्खे को अपनाने से स्किन ग्लोइंग और स्वस्थ लगने लगेगी।

5. दिल को बनाए हेल्दी :
तनाव आजकल सभी की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। इसलिए दिल के रोग और तनाव से ग्रसित लोगों की संख्या तेजी बढ़ती जा रही है। यदि आपके साथ भी ये परेशानी है तो तो तांबे के जग में रात को पानी रख दें। सुबह उठकर इसे पी लें। तांबे के बर्तन में रखे हुए जल को पीने से पूरे शरीर में रक्त का संचार बेहतरीन रहता है। कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहता है और दिल की बीमारियां दूर रहती हैं।

6. खून की कमी करता है दूर :
एनीमिया या खून की कमी एक ऐसी समस्या है जिससे 30 की उम्र से अधिक की कई भारतीय महिलाएं परेशान हैं। कॉपर के बारे में यह तथ्य सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक है कि यह शरीर की अधिकांश प्रक्रियाओं में बेहद आवश्यक होता है। यह शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को अवशोषित करने का काम करता है। इसी कारण तांबे के बर्तन में रखे पानी को पीने से खून की कमी या विकार दूर हो जाते हैं।

7. कैंसर​ से लड़ने में सहायक :
कैंसर होने पर हमेशा तांबे के बर्तन में रखा हुआ जल पीना चाहिए। इससे लाभ मिलता है। तांबे के बर्तन में रखा हुआ जल वात, पित्त और कफ की शिकायत को दूर करता है। इस प्रकार के जल में एंटी-ऑक्सीडेंट भी होते हैं, जो इस रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं। अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, कॉपर कई तरीके से कैंसर मरीज की हेल्प करता है। यह धातु लाभकारी होती है।

8. सूक्ष्मजीवों को खत्म करता है :
तांबे की प्रकृति में ऑलीगोडायनेमिक के रूप में ( बैक्टीरिया पर धातुओं की स्टरलाइज प्रभाव ) माना जाता है। इसीलिए इसके बर्तन में रखे पानी के सेवन से हानिकारक बैक्टीरिया को आसानी से नष्ट किया जा सकता है। इसमें रखे पानी को पीने से डायरिया, दस्त और पीलिया जैसे रोगों के कीटाणु भी मर जाते हैं, लेकिन पानी साफ और स्वच्छ होना चाहिए।

9. वजन घटाने में मदद करता है :
कम उम्र में वजन बढ़ना आजकल एक कॉमन प्रॉब्लम है। अगर कोई भी व्यक्ति वजन घटाना चाहता है तो एक्सरसाइज के साथ ही उसे तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी पीना चाहिए। इस पानी को पीने से बॉडी का एक्स्ट्रा फैट कम हो जाता है। शरीर में कोई कमी या कमजोरी भी नहीं आती है।

10. पाचन क्रिया को ठीक करता है :
एसिडिटी या गैस या पेट की कोई दूसरी समस्या होने पर तांबे के बर्तन का पानी अमृत की तरह काम करता है। आयुर्वेद के अनुसार, अगर आप अपने शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालना चाहते हैं तो तांबे के बर्तन में कम से कम 8 घंटे रखा हुआ जल पिएं। इससे राहत मिलेगी और पाचन की समस्याएं भी दूर होंगी।

 

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