Amazing Facts About Lord Shiva

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Lord Shiva is one of the most famous Gods in Hinduism along with Lord Vishnu. He is revered by millions of Hindu devotees everywhere who visit his Jyotirlinga temples in order to seek his blessings. The worship of Lord Shiva has several great benefits for the life of devotees.

Great Facts About Lord Shiva

1. Shiva is the third god in the Hindu triumvirate. He is accountable for the destruction of the world. He is often depicted as having a temper, but is mostly seen in a meditative state. The other two gods are Brahma and Vishnu. Brahma is responsible for the creation of the world and Vishnu is responsible for running the world.

2. He wears elephant and tiger skins, and carries live cobras that dangle from his neck and has dreadlocks. He is also known as the lord of the animals- Pashupati

Shiva has a third eye on his forehead, which represents his wisdom and intuition. He carries a trident, which represents the three function of the triumvirate.

3. Shiva is called the Lord of Dance, or the Nataraja. His most important dance is the Tandev, the cosmic dance of death, which he performs at the end of every age to destroy the universe. He also performs the Lasya, which is the dance of creation.

4. Legend says that Shiva lives a simple life in the Kailas Mountains of the Himalayas with his wife, Parvati. He is usually spotted in a yogic position. Whenever Parvati is present, she is always at the left hand side of Shiva.

5. Shiva is also represented by Shiva Lingam, a phallic statue that symbolizes masculinity and creation.

6. In some Hindu legend, Shiva is known for his reckless life style. He rides a bull, and he often smokes weeds. He also loves meditating, and is called the Lord of Yoga.

7. Shiva and Parvati are husband and wife. They have two sons- Ganesh and Murugan.

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भारत का रहस्यमय मंदिर, अंग्रेज इंजीनियर भी नहीं सुलझा सका इसकी गुत्थी…

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भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के एक छोटे से ऐतिहासिक गांव लेपाक्षी में 16 वीं शताब्दी का वीरभद्र मंदिर है। इसे लेपाक्षी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह रहस्यमयी मंदिर है, जिसकी गुत्थी दुनिया का कोई भी इंजीनियर आज तक सुलझा नहीं पाया।

ब्रिटेन के एक इंजीनियर ने भी इसे सुलझाने की काफी कोशिश की थी, लेकिन वह भी नाकाम रहा। मंदिर का रहस्य इसके 72 पिलरों में एक पिलर है, जो जमीन को नहीं छूता। यह जमीन से थोड़ा ऊपर उठा हुआ है और लोग इसके नीचे से कपड़े को एक तरफ से दूसरे तरफ निकाल देते हैं।

मंदिर का निर्माण विजयनगर शैली में किया गया है। इसमें देवी, देवताओं, नर्तकियों, संगीतकारों को चित्रित किया गया है। दीवारों पर कई पेंटिंग हैं। खंभों और छत पर महाभारत और रामायण की कहानियां चित्रित की गई हैं।

मंदिर में 24 बाय 14 फीट की वीरभद्र की एक वाल पेंटिंग भी है। यह मंदिर की छत पर बनाई गई भारत की सबसे बड़ी वाल पेंटिंग है। पौराणिक कथाओं के अनुसार वीरभद्र को भगवान शिव ने पैदा किया था। मंदिर के सामने विशाल नंदी की मूर्ति है। यह एक ही पत्थर पर बनी हुई है और कहा जाता है कि दुनिया में यह अपनी तरह की नंदी की सबसे बड़ी मूर्ति है।

वीरभद्र मंदिर का निर्माण दो भाइयो विरन्ना और विरुपन्ना ने किया था। वे विजयनगर साम्राज्य के राजा अच्युतार्य के अधीन सामंत थे।

लेपाक्षी गांव का रामायण कालीन महत्व है। यहां के बारे में एक किवदंती प्रचलित है कि जब रावण सीता का हरण करके लिए जा रहा था, तब जटायु ने उससे युद्ध किया था। इसके बाद घायल होकर जटायु यहीं गिर गया था। भगवान राम ने जटायु को घायल हालत में यहीं पाया था और उन्होंने उससे उठने के लिए कहा था। ले पाक्षी का तेलुगु में अर्थ है- उठो, पक्षी।

सावन माह के इस पावन अवसर पर भगवान शिव का गंगाजल से अभीषेक करेंके खुद को अनुग्रहित करे।
पवित्र एवं पावन गंगाजल उचित मुल्य पर घर बेठे प्राप्त ही करने के लिये सम्पर्क् करें।

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दो पहाड़ियों पर बने हैं 77 खूबसूरत मंदिर, कुछ ऐसा दिखता है नजारा!!!

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भारत के सभी धर्मों व फिलॉसफी में मोक्ष (Salvation) को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। काशी (बनारस) जैसी जगह के बारे में मान्यता है कि अगर वहां किसी की मृत्यु हो जाए तो उसे सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह खूबसूरत जगह काशी तो नहीं है, लेकिन जैन धर्म में इस जगह का स्थान और यहां की शांति और खूबसूरती का कोई जवाब नहीं। यहां की दो पहाड़ियों पर बने 77 सुंदर मंदिरों का नजारा किसी का भी मन मोहने के लिए पर्याप्त है।

सोनगीर नाम की ये जगह मध्य प्रदेश के दतिया जिले में है। जैन धर्म में इस जगह को बहुत सम्मान से देखा जाता है। कहा जाता है कि जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु यहां 17 बार आए थे। जैन धर्म में दिगंबर सम्प्रदाय के संत और अन्य भक्तों के लिए ये जगह महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में पूजी जाती है।
मोक्ष को लेकर ये हैं किवदंती
जैन धर्म के अनुयायियों और स्थानीय कथाओं की मानें तो किसी जमाने में राजा नांगनाग कुमार इसी जगह जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्त हुए थे और मोक्ष (Salvation) को प्राप्त किया था। कथा के मुताबिक उनके बाद जैन धर्म के संत और अनुयायी मोक्ष और निर्वाण की तलाश में इस जगह आने लगे।
132 एकड़ में है 77 खूबसूरत मंदिर
यहां पहाड़ी पर 132 एकड़ क्षेत्रफल में एक से बढ़कर एक 77 खूबसूरत मंदिर हैं। इनमें 57 नंबर का मंदिर मुख्य माना जाता है। मान्यता है कि आचार्य शुभ चंद्र और भर्तृहरि ने यहां रहते हुए कठिन तपस्या की। मंदिरों के इस परिसर को ‘लघु सम्मेद शिखर‘ भी कहा जाता है।

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यहां हैं डेढ़ लाख से भी ज्यादा शिवलिंग,पूजे जाते हैं सिर्फ एक…

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एक ऐसी नगरी,  जहां है डेढ़ लाख से भी ज्यादा शिवलिंग, लेकिन उनमें से केवल एक की ही पूजा की जाती है। इस नगरी में इतने शिवलिंग कैसे स्थापित हुए और क्यों केवल एक शिवलिंग की पूजा की जाती है इसके पीछे भी रोचक कहानी है।
प्राचीन समय में श्रीपुर के नाम से प्रचलित आज के सिरपुर की, करीब डेढ़ हजार साल पहले तक यह नगरी एक अतिविकसित और आधुनिक राजधानी के रूप में जानी जाती थी। लेकिन यहां आए बाढ़ और भूकंप की वजह से यह शहर जमींदोज हो गया। पिछले कई सालों से सिरपुर की खुदाई चल रही है, यहां दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध स्थल होने के प्रमाण भी मिले हैं।
कैसे आए यहां डेढ़ लाख शिवलिंग
सिरपुर में डेढ़ लाख से ज्यादा शिवलिंग होने के पीछे कहा जाता है कि छठवीं शताब्दी में महाशिव गुप्त बालार्जुन श्रीपुर के राजा थे। वे शिव के परमभक्त थे। उस समय श्रीपुर में बौद्ध, जैन और शैव लोगों की बाहुल्यता थी। बालार्जुन शिव की पूजा में ही सारा वक्त गुजारते थे, वह जहां जाते वहां से श्रीपुर के लिए एक शिवलिंग लेकर ही आते थे। इस तरह यहां सैकड़ों, हजारों शिवलिंग स्थापित होते गए। छठी शताब्दी में सिरपुर आए चीनी यात्री व्हेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में यहां डेढ़ लाख से ज्यादा शिवलिंग होने की बात लिखी है। सिरपुर की खुदाई में अब तक दस हजार शिवलिंग प्राप्त किए गए हैं, इनमें से एक को बनारस के काशी विश्वनाथ से भी पुराना बताया जाता है।
 होती है केवल एक की पूजा
केवल एक शिवलिंग की पूजा के पीछे की कहानी पुरातात्विक सलाहकार अरुण शर्मा बताते हैं। वे 12 साल से अधिक समय से सिरपुर की खुदाई में जुटे हुए हैं। उन्होंने बताया कि किंवदंती ये है कि बालार्जुन की भक्ति की प्रसन्न होकर शिवजी ने सपने में उन्हें दर्शन देकर कहा था कि सिरपुर लाने के बाद जिस शिवलिंग से विशेष खुशबू आएगी समझ लेना मेरा उसी में वास है। इसलिए बालार्जुन शिवलिंग लाते जाते और देखते जाते कि उससे सुगंध आ रही है या नहीं। अंत में एक शिवलिंग यहां लाया गया, जिससे तुलसी के पत्तों जैसी विचित्र सुगंध निकलती थी। खुशबू की वजह से इस शिवलिंग को गंधेश्वर महादेव नाम दिया गया और शिव के कहे अनुसार इसी में उनका वास समझकर इसकी पूजा शुरू हुई।

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Gangajal- the Holy Water!!!

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In Hinduism, the river Ganges is considered sacred and is personified as a goddess known as Ganga. It is worshipped by Hindus who believe that bathing in the river causes the remission of sins and facilitates Moksha(liberation from the cycle of life and death) the water of Ganga is considered very pure. Pilgrims immerse the ashes of their kin in the Ganges, which is considered by them to bring the spirits closer to moksha.

The holy waters of River GangaGangajal, originating from the Himalayas, cover huge distances falling through the mountains.

The water is revered for its crystal-clear purity which is known as the divine mix of multi-minerals and unique herbs.

Sealed hermetically, untouched by human hands or other impurities, we try to keep intact all its natural qualitative aspects that improve digestive system, preserve elements of its goodness. It has high stimulant properties that are believed to possess the ability to enhance and retain wisdom. It has the capability to cure many ailments. Since ancient times, it has been believed that Gangajal possesses natural elements that have healing properties for ‘upachar’.

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साइंस के लिए पहेली से कम नहीं है ये शिवलिंग, रोज 3 बार बदलता है अपना रंग…

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सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव की पूजा का खास महत्व होता है। भोले भंडारी भी इस दौरान अपने भक्तों को निराश नहीं करते हैं और खुलकर मुरादें पूरी करते हैं। राजस्थान के धौलपुर में चम्बल नदी के बीहड़ों में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर पर इन दिनों भक्तों का तांता लगा हुआ है। इसकी कारण है यहां का चमत्कारिक शिवलिंग, जो दिन में 3 बार अपना रंग बदलता है।
रोज 3 बार बदलता है शिवलिंग का रंग
धौलपुर का यह शिवलिंग दिन में 3 बार अपना रंग बदलता है। शिवलिंग का रंग दिन में लाल, दोपहर को केसरिया और रात को सांवला हो जाता है। ऐसा क्यों होता है इसका जवाब अब तक किसी वैज्ञानिक को नहीं मिल सका है। कई बार मंदिर में रिसर्च टीमें आकर जांच-पड़ताल कर चुकी हैं। फिर भी इस चमत्कारी शिवलिंग के रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है।
शिवजी की कृपा से मिलता है मनचाहा वर
चमत्कारी शिवलिंग के विषय में ऐसा माना जाता है कि जो भी कुंवारा या कुंवारी यहां शादी से पहले मन्नत मांगने आते हैं तो बहुत जल्दी उनकी मुराद पूरी हो जाती है। लड़कियों को मनचाहा वर भी शिवजी की कृपा से मिलता है। शिवलिंग की मान्यता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
एक हजार साल पुराना है शिव मंदिर
यहां आने वाले भक्तों की मानें तो शिव मंदिर करीब हजार साल पुराना है। बुर्जुगों बताते हैं कि मंदिर बीहड़ में होने से पहले यहां भक्त डर की वजह से कम आते थे, क्योंकि यहां जंगली जानवरों और दस्युओं का आना-जाना था। लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं और दूर-दूर से लाखों की संख्या में भक्त यहां आने लगे हैं।
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आज है सावन का आखिरी सोमवार आज, गूंज रहे है भोले के जयकारे!!!

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आज सावन का चौथा और अंतिम सोमवार है जो श्रद्धालुओं को आर्थिक परेशानियों से छुटकारा दिलाने वाला साबित हो सकता है। इस दिन भक्तिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है। कार्यक्षेत्र और जीवन के दूसरे क्षेत्रों में आने वाली बाधाओं का निवारण होता है। दांपत्य जीवन में आपसी प्रेम और सहयोग बढ़ता है। साथ ही आर्थिक परेशानियों में कमी आती है और जीवन पर आने वाले संकट से भगवान शिव रक्षा करते हैं।

सावन के अंतिम सोमवार के मौके पर देशभर के शिवालयों में रुद्राभिषेक के विशेष आयोजन किए गए हैं। मंदिरों में सुबह से ही भोलेनाथ पर जल चढ़ाने वालों की लंबी कतार दिख रही है। हर तरफ हर-हर महादेव और बम-भोले की गूंज सुनायी दे रही है। श्रद्धालु, भोलेनाथ को प्रसन्न करने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के शिवालयों में भी शिव जाप के साथ ही जलाभिषेक के विशेष कार्यक्रम की व्यवस्था की गई है। राजेंद्र नगर स्थित श्री महाकाल मंदिर में सावन सोमवार की आखिरी भस्म आरती होगी। मंदिरों में उमड़ने वाली भीड़ को देखते हुए सुरक्षा की भी खास व्यवस्था की गई है।

तो वहीं, डालीगंज स्थित श्री भोलेश्वर महादेव मंदिर में सोमवार को बाबा के दरबार को बर्फ से सजाया जाएगा। शाम को मंदिर में भजन संध्या का आयोजन किया गया है। तो वहीं, कोनेश्वर मंदिर में शयन आरती शाम 7 बजे होगी।

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२६ मुंह, ५२ हाथ वाली शिव प्रतिमा

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आइए आज अनूठी शिव प्रतिमाओं में से एक प्रतिमा के दर्शन कीजिए।
यह अनूठी प्रतिमा तमिलनाडू के सूचिंद्रम नामक स्थान पर प्रतिष्ठित है।

  •  इस अनूठी प्रतिमा में भगवान शिव के २६ मुख लिंगाकार रूप में है।
  • भगवान के कुल ५२ हाथ भी इस प्रतिमा में देखे जा सकते हैं।
  • इस अद्भुत प्रतिमा को अपने तमाम ग्रुप में सेंड कर के अपने परिचितों को भी सावन सोमवार पर भगवान शिव के अप्रतिम रूप के दर्शन कराने का पुण्यलाभ लीजिए।

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कई चमत्कारों से भरी हैं इस ज्योतिर्लिंग की कहानियां

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द्वारिका के पूर्वोत्तर में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। शिवपुराण के अनुसार, जो भी व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति और समर्पण के भाव से इस ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना करता है, उसे संसार के सभी सुख मिलते हैं।
कैसे स्थापित हुआ नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
कहा जाता है कि सुप्रिय नाम का एक वैश्य भगवान शिव का भक्त था। वह हर समय भगवान शिव की भक्ति में लगा रहता था। एक बार सुप्रिय नाव से कहीं जा रहा था, तभी अचानक दारुक नाम का राक्षस वहां आ गया। दारुक ने नाव पर सवार सभी लोगों को बंदी बना कर अपने बंदीगृह में डाल दिया। बंदीगृह में भी सुप्रिय भगवान शिव की भक्ति करता रहा। जब दारुक को इस बात का पता चला तो वह सुप्रिय को ऐसा करने से रोका, लेकिन सुप्रिय ने उसकी बात नहीं मानी और अपनी भक्ति में लीन रहा। इस बात से दारुक को बहुत गुस्सा आया और उसने अपने सेवकों को सुप्रिय का वध करने को कहा। सुप्रिय डरा नहीं और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करता रहा। जैसे ही दारुक के सेवक सुप्रिय का वध करने पहुंचे, उस बंदीगृह के एक ऊंचे स्थान पर भगवान शिव प्रकट हुए और सुप्रिय को पाशुपतास्त्र भी दिया। उस पाशुपतास्त्र से सुप्रिय ने दारुक सहित सभी राक्षसों का वध कर दिया। मृत्यु के पहले दारुक अपनी मुक्ति के लिए भगवान शिव और माता पार्वती से प्रार्थना करने लगा। उसके प्रार्थना करने पर भगवान ने उस उसकी मुक्ति का और इस स्थान को उसी के नाम से प्रसिद्ध होने का वरदान दिया। सुप्रिय ने भगवान शिव से हमेशा के लिए इसी स्थान पर रहने की प्रार्थना की, जिसके फलस्वरूप भगवान शिव नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से उसी स्थान पर स्थित हो गए।

अपने आप ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी हो गया
नागेश्वर मंदिर का ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी है, जबकि गोमुख पूर्वमुखी। ऐसा होने के पीछे एक रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है नामदेव नाम का एक भक्त भगवान शिव के सामने खड़ा होकर भजन कर रहा था। पीछे खड़े भक्तों ने उसे एक ओर हटकर भजन गाने को कहा, ताकि उन्हें भगवान शिव के दर्शन हो सके। भक्तों के ऐसा कहने पर नामदेव ने उनसे ऐसी दिशा के बारे में पूछा जहां भगवान शिव न हो, वह उस ओर खड़ा होकर भजन करता रहे। लोगों ने गुस्से में नामदेव को एक तरफ कोने में धकेल दिया। नामदेव वहीं कोने में खड़ा होकर भगवान शिव के भजन गाने लगा। थोड़ी देर में शिवलिंग का मुंह अपने आप उस ओर हो गया, जिस ओर खड़े होकर नामदेव भजन कर रहा था। यह देखकर सभी भक्त हैरान रह गए। तब से लेकर आज तक भगवान शिव का यह नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी ही है।

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Baidyanth Dham Gath Bandhan Pooja – A Special Pooja During Shravan Maas

Baidyanth Dham Gath Bandhan Pooja

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Importance Of Baidyanath Dham

Baidyanath Dham at Deoghar in Jharkhand is a very special temple dedicated to Lord Shiva. Each year it draws millions of devotees, who come to seek the powerful blessings of the Baidyanath Lingam of Lord Shiva. Here are some intriguing facts about the Baidyanath Dham Jyotirlinga. Some legends say that the lingam of Lord Shiva here laid abandoned after Ravana’s death and it was found and deified again by a hunter named Baiju.
Devotees come here to pour Gangajal to soothe Lord Shiva’s throat, which he injured while drinking poison after the Samudra Manthan episode of Indian mythology. Gangajal, milk and panchamrit abhishekam appeases the Lord and keeps him content. According to Hindu mythology, Goddess Sati’s heart had fallen here after Vishnu had cut her body off into 52 pices; when Shiva was carrying her all across the land.

Maa Parvati Temple

There is another important temple beside the Baidyanath temple known as the Mata Parvati temple. It is believed that this temple is situated at the very spot where the heart of Maa Sati fell after the incident of Daksha Yagna. It is quite a significant shrine of Mata and its close location to the Baidyanath Dham Temple is a sign of unity between Lord Shiva and Maa Shakti.
Gath Bandhan – A Special Ritual
During the holy month of Shravan, hundreds of red threads are tied to connect the domes of the Baidyanath Dham Temple and the Maa Parvati temple. This ceremony is known as the Gath Bandhan and can be performed by devotees. Devotees offer the threads which are tied by a person who climbs to the top of the Baidyanath temple dome (Panchsul).
Pandas chant slokas and then Bhandaris (members of a local tribal community) climb the domes of the temples and tie the sacred threads. This is a powerful ritual which has great benefits for the lives of devotees.
Benefits of Gath Bandhan
1. Devotee couples can gain a happy and prosperous married life.
2. Familial harmony increases significantly.
3. This ceremony gives the devotees protection from serious diseases and ailments.
4. Young women who are looking for the ideal life partner can gain so by performing this ritual.
5. It reduces the negative effects of planets such as Shani on one’s life.

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